फिर खुले ‘दयाशंकर की डायरी’ के पन्ने

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जयपुर। आशादर्शन कला संस्थान की ओर से रविवार को नादिरा जहीर बब्बर के नाटक ‘दयाशंकर की डायरी’ का मंचन किया गया। जब भी किसी नाटक का मंचन किया जाता है तो उसे एक टीम के रूप में ही तैयार किया जाता है तो कई बार वह नाटक शुद्ध रूप से निर्देशक का होकर रह जाता है लेकिन यह नाटक देखकर लगा कि यह नाटक निर्देशक और टीम से निकलकर एक्टर के प्लेटफॉर्म पर आ कर खडा हो गया है। पूरे नाटक में एम. इलियास खान यूसुफजई का अभिनय केन्द्र में रहा। खासकर लडकी या महिला का अभिनय करते समय भी उनका अभिनय जरा भी विचलित नही हुआ। वो जब लड़की बने तो लड़की और महिला का रूप रखा तो महिला ही नजर आ रहे थे। नाटक का छिपा मर्म सहज ही दर्शको के दिल में उतर गया। एकपात्रिय नाटक गहरे धैर्य, समझ, संवेदनशलीता, कलाकार की अभिनय क्षमता के साथ—साथ शो को अपेक्षित समय तक ले जाने की कुशलता की भी मांग करता है। इलियास ने इस सभी का परिचय इसमें देने की कोशिश की है और उसमें सफल भी हुए है। इससे पहले भी इलियास इसके शो कर चुके है, लेकिन इस बार का शो उन्होने नई अभिव्यक्ति और नए कॉस्ट्यूम्स के साथ् किया। उन्होने इसके कथानक में भी अपने सोच के मुहावरे डालकर इसे नादिरा और आशीष विद्यार्थी की प्रस्तुुति से अलग बनाने की बेहतरीन कोशिश की है।
‘दयाशंकर की डायरी’ नाम से लगता है कि डायरी के पन्नों में दर्ज किस्सों की परतें खुलेंगी, मगर यह डायरी से अलग दयाशंकर की आत्मकथा कहने लगती है। सपना देख रहे एक आदमी की त्रासदी उसे पागलपन से लेकर मौत के मुंह तक धकेल देती है और यह स्थिति समाज से यह सवाल पूछती है कि क्या आम आदमी को आज सपने देखने की इजाजत भी नही है।

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