साहित्य मेरे लिए सदियों से बेड़ियों में जकड़े मानव की आपबीती: उम्मेद धानियां

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चंडीगढ़। हाल ही में साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित राजस्थानी के चर्चित कथाकार  राजपुरा के उम्मेद धानियां ने शनिवार को चंडीगढ़ के रोज गार्डन में हुए लेखक सम्मिलन में भाग लिया। ख्यातनाम पंजाबी साहित्यकार रवैल सिंह के संयोजन में हुये सम्मिलन में ‘मैं और मेरा लेखन ‘ बिषय पर बोलते हुए उम्मेद धानियां ने कहा कि उनके लिये साहित्य कुंठा, पीड़ा, वेदना, नकार और अस्मिता के सवाल के साथ-साथ यथार्थ का कड़वा सच है। उन्होंने कहा कि साहित्य मेरे लिए व्यवसाय के नाम पर सदियों से बेड़ियों में जकड़े मानव की आपबीती पटकथा है, जो हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद भी वाजिब और जिंदा रहने लायक मजदूरी को तरसता है।
धानियां ने कहा कि उन्होंने जो जीवन जिया है वो नहीं होता तो ये लेखन भी नहीं होता! वे जिस वर्ण से आते हैं, उसकी तक़रीबन सभी जातियों में आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी ग़रीबी, भुखमरी , अशिक्षा, अंधविश्वास, भूमिहीनता, साहूकारों का शोषण, जातीय और धार्मिक आधार पर भेदभाव, बंधुआ मज़दूरी , हीनता, अपमान और उपेक्षा का दंश झेलती पीढ़ियां हैं, उसका मैं भी एक नुमाइंदा हूँ। इसी भूखमरी और ग़रीबी के कोढ ने बचपन में ही माँ को लील लिया। माँ को पैर में साँप ने काट लिया..पैसे के अभाव में हम किसी अस्पताल में उनका ईलाज नहीं करवा सके, घर पर ही झाड़ -फूँक करवाते रहे। पाँचवें दिन माँ ने आख़िरी साँस ली थी। मैं चार भाइयों में तीसरे नम्बर पर था। माँ का यूँ चले जाना, बाप का शराबी हो जाना  और विरासत में मिला सदियों का जातीय दंश। इन प्रतिकूलताओं में आप सोच सकते हैं कि मेरा जीवन कैसा रहा होगा। ग़रीबी की बात करूँ तो वो आज भी इस देह के साथ खाल की तरह चिपकी हुई है। इन कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी मैंने आठवीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है। फिर आर्थिक तंगी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा। लेकिन पढ़ाई छूटने का मलाल बना रहा। फिर दो साल बाद दसवीं प्राईवेट पास की। हमारे गाँव में चमार जाति में आज़ादी से पहले की तो बात ही क्या करें, आज़ादी के बाद भी 2001 में दसवीं पास करने वाला मैं पहला व्यक्ति हूँ। लेकिन घर की ख़राब आर्थिक स्थिति ने मुझे आगे नही पढ़ने दिया। मैं किसी स्कूल में एडमिशन नहीं ले सका लेकिन दिल की तमन्ना अभी अधूरी थी। पढ़ाई छूट जाने का दर्द बराबर सालता रहा। फिर लेखन से जुड़ाव के कारण मुझे बहुत ही अच्छे और गुणी लोग मिले, जिन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया खोया हुआ आत्मविश्वास फिर जगाया। इसी कारण सम्भव हुआ कि अधूरी रह गई पढ़ाई फिर शुरू कर सका और तेरह साल बाद यानि 2014 में ऑपन स्कूल से बारहवीं पास की, फिर लगातार स्नातक पास की।
उम्मेद ने कहा, जहाँ तक लेखन का सवाल है साहित्य मेरे लिए कोई ख़ुशी का गीत नहीं है और ना ही मन बहलाने या मनोरंजन का ज़रिया है और ना ही अलौकिक चमत्कार। साहित्य मेरे आक्रोश की अभिव्यक्ति है। बालपन से ही मुझे अपने आसपास घटने वाली तमाम घटनाएँ जो इन्सानियत के खिलाफ थी, विचलित करती थी। किसी पर अत्याचार होते देख भीतर जो आक्रोश उभरता था वो कब शब्दों में आकार लेने लगा पता ही नहीं चला।
इस दौरान साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवास राव, राजस्थानी साहित्यकार दुलाराम सहारण, उम्मेद गोठवाल, रामगोपाल इसराण, कुमार अजय, सुमन धानियाँ, पंकज धानियाँ, दीनदयाल शर्मा, ऋतुप्रिया, दुष्यंत जोशी सहित सभी भाषाओं के युवा अवार्डी, साहित्यकार, साहित्यप्रेमी मौजूद थे।

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