37 वीं पुण्य तिथि पर सुरों की बरसात से याद किया “ मोहम्मद रफी को “

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जयपुर। 37 वीं पुण्य तिथि पर सुरों की बरसात से याद किया “ मोहम्मद रफी को “ ‘तुम जो मिल गये हो…’ यह गीत सुनते ही आज भी मोहम्मद रफी की मखमली आवाज़ का जादू ज़हन में छाने लगता है. बॉलीवुड के सबसे मशहूर पार्श्वगायक रहे मोहम्मद रफी को गुज़रे हुए 37 वर्ष बीत गए हैं, लेकिन चाहे रोमांटिक गाने हों, दर्दभरे नग़मे, शादी-ब्याह का माहौल, देशभक्ति गीत या भजन उनके गाये गीतों का जादू आज भी कायम है. आज जयपुर के जवाहर लाल नेहरु मार्ग स्थित “ कलानेरी आर्ट गैलरी “ में “ साज़ और आवाज़ कल्चरल सोसाईटी “ ने महान गायक मोहम्मद रफी की 37 वीं पुण्यतिथी पर एक से बढ्कर एक फिल्मी नगमों को पेश किया. “ तुम जो मिल गये हो “ नामक गीतों भरी शाम में रफी साहब के सुपर हिट गानों की पेशकश की गयी .
“ रात के हमसफर थक के घर को चले .. “ ,
“ एक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल , सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दे दी “ ,
“ ले गयी दिल गुडिया जापान की, पागल मुझे लर गयी “,
“ बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा “
“ मुझे इश्क है तुझी से मेरी जाने ज़िंदगानी “
“ आज मौसम है बडा, बईमान है बडा “
इन नगमों को अपनी सुरीली आवाज़ में मुनव्वर अली, जय शर्मा, मुक्ता सिंघवी, नवाब, विजय शर्मा, असलम, सिराज और मुजीब अब्दुल्लाह ने सजाया था. कार्यक्रम के अंत में कलानेरी की निदेशक सोम्या शर्मा ने आये हुए अतिथियों और कलाकरों का अभार व्यक्त किया|

यादों में “ मोहम्मद रफी “

पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर, 1924 को एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्मे रफी साहब बचपन में एक फकीर के गाए गीतों को बहुत ध्यान से सुना करते थे और उन्हीं से प्रेरणा लेकर आखिरकार वह सुरों और आवाज़ की दुनिया के बेताज बादशाह बने. बचपन में उन्हें अपने परिवार से भी शौक को पूरा करने में सहयोग और मदद मिली और उन्होंने लाहौर में उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी. इसके अलावा रफी साहब ने गुलाम अली खान से भारतीय शात्रीय संगीत की तालीम ली थी.
वैसे मोहम्मद रफी ने अपना पहला फिल्मी गीत वर्ष 1944 में बनी पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के लिए गाया था, जिसके संगीत निर्देशक श्याम सुंदर थे, लेकिन पहला हिन्दी फिल्मी गीत गाने का अवसर उन्हें नौशाद ने फिल्म ‘पहले आप’ में दिया. वर्ष 1946 में मुंबई आकर बस गए रफी साहब ने वर्ष 1949 में नौशाद के ही संगीत निर्देशन में ‘दुलारी’ फिल्म के गीतों से सफलता की ऊंचाइयों को छुआ. अपने सक्रिय काल के दौरान बॉलीवुड के लगभग हर बड़े अभिनेता को अपनी आवाज़ से अमर कर देने वाले रफी का 31 जुलाई, 1980 को निधन हो गया.
मोहम्मद रफी ने 5000 से ज़्यादा गाने गाये . 6 फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड रफी के नाम हैं. वर्ष 1976 में उन्हें भारत सरकार कि तरफ से ‘पद्म श्री’ सम्मान से भी नवाज़ा गया था. रफी साहब ने 19 भारतीय भाषाओं मे जैसे असामी , कोंकणी , पंजाबी , उड़िया , मराठी , बंगाली , भोजपुरी के साथ-साथ उन्होंने पारसी, डच, स्पेनिश और इंग्लिश में भी गीत गाए थे.

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