कवि टीकम बोहरा ‘अनजाना’ के पहले काव्य संग्रह ‘मां से प्यारा नाम नहीं’ का लोकार्पण

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मां से जुड़ी अनुभूतियों को दिया काव्य का रूप। बड़ी संख्या में साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों ने की शिरकत

जयपुर। राजस्थान प्रषसनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी टीकम चन्द बोहरा की मां से जुड़ी अनुभूतियों के कामां से जुड़ी अनुभूतियों को दिया काव्य का रूपव्य संग्रह मां से प्यारा नहीं नहीं का शनिवार को सूचना केंद्र में आयोजित समारोह में लोकार्पण किया गया। बोहरा साहित्य जगत में टीकम बोहरा ‘अनजाना’ के नाम से जाने जाते हैं। राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत, पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेषक एवं वरष्ठि साहित्यकार आर.पी. सिंह, पद्मश्री डॉ. चंद्र प्रकाष देवल और राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की निदेषक डॉ. अनीता नायर ने संयुक्त रूप से इसका लोकार्पण किया। प्रो. गजानन्द चारण द्वारा संयोजित इस समारोह में पुस्तक के प्रकाष बोधी प्रकाषन के संदीप मायामृग सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार और साहित्य प्रेमी भी मौजूद थे।

कवि जीवन पद्धति की प्रतिध्वनि है

इस मौके पर अपने उद्बोधन में ओंकार सिंह लखावत ने कहा कि कवि जीवन पद्धति की प्रतिध्वनि है। जो श्रेष्ठता से जीया गया, जो जीया जा रहा है और जैसा जीना चाहिए उसका मापदंड खरी-खरी भाषा में प्रस्तुत करने का साहब कवि का ही हो सकता है। कवि का तत्पर्य सच को सच कहना होता है और वह समाज को असत्य के आडम्बर से बच कर रहने का परामर्ष देता है। टीकम बोहरा अनजाना सी राष्ट्रीय परंपरा का अपनी लेखनी के द्वारा निर्वहन कर रहे हैं। उनकी कविता के पात्र और विषय भी अत्यधिक गंभीरता लिए हुए प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि विष्व की विभिन्न भाषओं के शब्दकोष में करोड़ों नाम अंकित हैं परंतु मां से प्यारा नाम नहीं कह कर बोहरा ने मां को इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ आदर योग्य रचना कहा है। इनकी रचनाएं हर पीढ़ी और हर वर्ग के लोगों के लिए सुसंस्कार देने वाली रचनाएं हैं।
पुस्तक के लेखक टीकम बोहरा अनजाना ने कहा कि इस संग्रह में समाहित रचनाएं सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं है, ये मेरे अपने जज्बात हैं। जमाना जिसे कविता कहता है वो मेरे अनुभव की बातें हैं। उन्होंने कहा कि मां ने मुझे रूप-आकार दिया, मां ने ही मुझे यह संसार दिया। मां का मेरे जीवन में सबसे बड़ा महत्व है, मां से ही तो मेरा अस्तित्व है। जिस भाषा में मां मुझसे पहला शब्द बोली वही भाषा मेरी मातृभाषा हो गई।
कविताएं सिर्फ शब्द संग्रह नहीं हैं

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