कहानी : नवंबर 1971 में दुनिया के नक्शे में आज के बांग्ला देश की पहचान ईस्ट पाकिस्तान के नाम से हुआ करती थी। उस दौर में पूर्वी पाकिस्तान में दमन और नरसंहार का दौर चल रहा था। पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाला हर शख्स पाकिस्तानी सेना के जुल्म का शिकार था। पूर्वी पाकिस्तान में आजादी की मांग करने वाले बेगुनाह नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना ने ऐसा दमन चक्र चला रखा था, जिसकी हर देश में जमकर आलोचना हो रही थी। इसी दौर में17 नवंबर 1971 को इंडियन नेवी के हेडक्वॉर्टर में एक सीक्रेट जानकारी आती है कि पाकिस्तानी नेवी बीच समुद्र में देश की रक्षा में तैनात भारत के सबसे बड़े समुद्री बेड़े आईएनएस विक्रांत पर हमला कर सकती है। नेवी हेडक्वॉर्टर के आला अफसर नंदा (ओम पुरी) इस सूचना की पूरी जांच कर लेना चाहते हैं। इसी मकसद से नंदा एक ऑपरेशन सर्च लैंड टीम बनाते हैं। इस सर्च टीम की कमान पनडुब्बी एस 21 के कैप्टन रणविजय सिंह (के.के. मेनन) के साथ साथ लेफ्टिनेंट कमांडर अर्जुन (राणा दग्गुबाती) को सयुंक्त रूप से दी जाती है। दरअसल, नंदा जानते हैं कि कैप्टन रणविजय सिंह कुछ ज्यादा ही अग्रेसिव और गुस्सैल हैं, दुश्मन को सामने पाते ही सिंह दुश्मन को वहीं खत्म करना ठीक समझते हैं। एस 21 पनडुब्बी की इस सर्च टीम में इनके साथ एक और ऑफिसर देवराज (अतुल कुलकर्णी) भी हैं। समुद्र के करीब तीन सौ मीटर नीचे जाकर इस टीम का मुकाबला पाकिस्तानी नेवी के अति आधुनिक और जंग की सभी सुविधाओं और तकनीक से सुसज्जित पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाजी के साथ होता है। समुद्र में कैप्टन रणविजय दुश्मन की पनडुब्बी को सामने पाकर उसे खत्म करना चाहते हैं, वहीं लेफ्टिनेंट कमांडर अर्जुन का मानना है जब तक हेडक्वॉर्टर से आदेश न आ जाए उस वक्त तक कुछ नहीं करना चाहिए।
ऐक्टिंग : डायरेक्टर संकल्प और प्रडयूसर की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर कमाई करने वाले स्टार्स का मोह छोड़कर इस फिल्म के लिए उन्हीं कलाकारों का चयन किया जो किरदारों की डिमांड पर सौ फीसदी फिट हो। कैप्टन रणविजय सिंह के किरदार में के.के. मेनन, देवराज के रोल में अतुल कुलकर्णी के साथ-साथ लेफ्टिनेंट कमांडर अर्जुन के किरदार में राणा दग्गुबाती सभी ने अपने जीवंत अभिनय से अपने किरदार में जान डाली है। ओम पुरी अपने किरदार में सौ फीसदी फिट रहे। काश पुरी साहब, अपनी इस फिल्म बेहतरीन फिल्म को देख पाते। रिफ्यूजी डॉक्टर बनी अनन्या (तापसी पन्नू) का किरदार बेशक छोटा है, लेकिन तापसी अपनी पहचान छोड़ने में कामयाब रहीं।
निर्देशन : बतौर डायरेक्टर संकल्प रेड्डी की यह पहली फिल्म है, इसके बावजूद उनकी स्क्रिप्ट पर पूरी पकड़ है। कसी स्क्रिप्ट और जानदार निर्देशन का असर है कि अंत तक आप पूरी फिल्म के साथ बंध जाते हैं। संकल्प ने वीएफएक्स और बैकग्राउंड स्कोर को बेहतरीन बनाने के लिए मेहनत की है। के.के. मेनन और दग्गुबाती के बीच संवाद सटीक हैं। संकल्प की यह फिल्म एक ऐसी जंग के बारे को बताने की ईमानदार कोशिश है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। संकल्प की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने पूरी रिसर्च और कम्प्लीट होम वर्क के बाद इस प्रॉजेक्ट पर काम शुरु किया। यह यकीनन रेड्डी के बेहतरीन निर्देशन का ही कमाल है कि करीब सवा दो घंटे की यह फिल्म देखते वक्त आप इमोशनल भी हैं तो खुद को भारतीय कहलाने पर गर्व भी महसूस करते हैं। वहीं संकल्प ने समुद्र के बीच पनडुब्बी के अंदर और बाहर की घटनाओं को अच्छे ढंग से पेश किया है।
क्यों देखें : बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक आ रही चालू मसाला फिल्मों को देखकर आप यह सोचने लगे हैं कि अब अच्छी और नए सब्जेक्ट पर फिल्में बननी बंद हो चुकी है तो ‘द गाजी अटैक’ एकबार जरूर देखें। एक ऐसी जंग जिसके बारे में शायद आप नहीं जानते उस जंग को देखने का अच्छा मौका है।

































