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पीरियड फिल्म में प्यार की ज़बरदस्त कहानी है रंगून ।

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फिल्म : रंगून
डायरेक्टरः विशाल भारद्वाज
स्टार कास्ट: कंगना रनोट, शाहिद कपूर और सैफ अली खान

यह कहानी भारत में आजादी से पहले की है, जिसमें युद्ध के साथ-साथ आपको रोमांस भी देखने को मिलेगा। जैसा कि आपको पता ही है, इस आजादी की लड़ाई में देश के अलग-अलग सपूतों का अपना-अपना अलग तरीका था। महात्मा गांधी ने आजादी के लिए अहिंसा को अपनाया, सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजों को देश से बाहर करने के लिए आजाद हिंद फौज का गठन किया। …और ऐसे ही संघर्ष के बीच दिलेर जूलिया (कंगना) 40 के दशक में कई दिलों पर राज कर रही होती हैं। जहां एक तरफ उनका शादीशुदा प्रड्यूसर रूसी बिलमोरिया (सैफ) उनपर फिदा रहता है, वहीं बॉर्डर पर तैनात जमादार नवाब मलिक (शाहिद) भी उससे बेइंतहां प्यार करता है।

रंगून रिव्यू: ‘रंगून’ एक महत्वकांक्षी कोशिश है, एक ऐसी फिल्म बनाने की जो प्रेम त्रिकोण पर बेस्ड है लेकिन युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। 1942 में आई ‘कैसाब्लांका; और 2002 में आई ‘शिकागो’ से इस फिल्म का इतिहास काफी मेल खाता है, लेकिन अगर इस फिल्म का संगीत कुछ और मजेदार होता तो बेहतर होता जो फिल्म के बीच-बीच में आता है। कई भयंकर वॉर सीन के बीच कुछ नाच-गाने के साथ-साथ आपको एक अच्छा रोमांस भी देखने को मिलेगा। इन सब मसालों के बीच फिल्म में एक घुसपैठिए का ऐंगल भी है जो फिल्म में किसी साजिश की ओर इशारा करता है।

निर्देशक विशाल भारद्वाज जिनकी फिल्मों के खजाने में ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’ और ‘हैदर’ जैसी बेहतरीन फिल्में हैं…उन्होंने इस फिल्म को भी अच्छा बनाया है लेकिन पूरी तरह से नहीं। फिल्म के कुछ सीन जहां बेवजह डाले हुए लगते हैं वहीं कुछ सीन बेहद ऊबाऊ हैं। काफी ज्यादा वॉर सीन, प्यार और धोखे को दिखाने के चक्कर में इसका अंत कुछ बेतरतीब नज़र आ रहा है और दर्शकों के मन में कश्मकश वाली स्थिति रह जाती है।

इस फिल्म में सैफ ने जहां अपने व्यापारी के किरदार को बेहद सटीक तरीके से निभाया है वहीं, शाहिद का अभिनय दमदार है। कंगना यकीनन फिल्म में सबसे अहम हैं। उनके लिए दो लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। जहां रूसी के लिए जूलिया बेशकीमती हैं, वहीं देशभक्त नवाब के दिलों की धड़कन जो कि उसकी बहादुरी से प्यार करता है। भले ही लव सीन काभी अच्छी तरह से लिखे और काफी खूबसूरती से शूट किए गए हैं, लेकिन उनमें जुनून का अभाव नज़र आ रहा है। शाहिद और कंगना के बीच हुए इतने सारे लिप-लॉक सीन में भी वह जुनून नज़र नहीं आता।

फिल्म में एक डायलॉग है, जिसमें सैफ ब्रिटिश ऑफिसर को कहता है, ‘हम ऐक्टर्स हैं, हम जानते हैं लोगों को कैसे राजी किया जाता है।’ यह यहां पूरी तरह से फिट नहीं। जूलिया फिल्म में बार-बार कहती हैं, ‘ब्लडी हेल’…काश इन तीनों अभिनेताओं ने सचमुच इस बात को अपनाकर खुद को इस किरदार में पूरी तरह से डूबो लिया होता तो यह फिल्म हर लिहाज से एक दूसरे ही लेवल पर पहुंच जाती।

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