पंजाबी साहित्य के जाने-माने लेखक गुरदयाल सिंह का पंजाब में निधन हो गया है. वो ‘मड़ी दा दीवा’ और ‘अन्ने घोड़े दा दान’ जैसे उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं. गुरदयाल सिंह को साहित्य अकदामी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और पदमश्री भी मिल चुका है.
उनके उपन्यास मड़ी दा दीवा पर 1989 में पंजाबी फ़िल्म बनी थी जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
निर्देशक गुरविंदर सिंह ने उनकी किताब अन्ने घोड़े दा दान पर 2011 में फ़िल्म बनाई थी जिसे भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
गुरदयाल सिंह के योगदान पर पंजाब की मशहूर लेखिका दलीप कौर टीवाना से बीबीसी संवाददाता ने बात की :
दलीप कौर टीवाना
गुरदयाल सिंह ने उपन्यास की विधा में बड़ा योगदान किया है. उन्होंने हमेशा यथार्थवादी उपन्यास लिखे जो हक़ीकत के बेहद करीब थे.
गुरदयाल कभी किसी वाद से बंधे हुए नहीं थे- किसी इज़्म में उनका भरोसा नहीं था. वो आँखों देखी सच्चाई को अपने उपन्यासों में उकेरते थे.
उनकी लेखनी की सबसे ख़ास बात थी कि वो ग़रीब, मज़बूर, हाशिए पर रहने वाले लोगों की बात अपनी कहानियों में करते रहे क्योंकि वो दिल से निकली हुई बात थी, वो ख़ुद मुश्किल हालात और ग़ुरबत से होकर निकले थे इसलिए उनके लफ़ज़ों के सहारे लोगों के दिल तक आसानी से बात पहुँच जाती थी. वो हमेशा से अपने आस पास की घटनाओं, हालातों के बारे में बड़े जागरुक रहते थे.
उन्होंने सीमित संसंधानों के बावजूद बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कीं, उन्हें बड़े मान सम्मान मिले.
आज दलितों, पिछले वर्ग को लेकर ज़ोर शोर से आवाज़ उठ रही है लेकिन गुरदयाल सिंह ने आज से दशकों पहले अपने चर्चित पंजाबी उपन्यास मड़ी दा दीवा में इस मुद्दे को उठाया था.
उनके उपन्यास का पात्र ग़रीब-शोषित वर्ग का है, वो बताते हैं कि कैसे उसके साथ भेदभाव होता है, कैसी उसकी शादी तक नहीं हो पाती…ये 60-70 के दशक की बात है. यूँ तो गुरदयाल सिंह ने बहुत उपन्यास लिखे हैं पर मैं मड़ी दा दीवा को उनका सबसे बड़ा उपन्यास मानती हूँ.
गुरदयाल सिंह का जन्म एक छोटे से गाँव में एक ऐसे परिवार में हुआ जो कारपेंट्री का काम करता था. उनके पिता चाहते थे कि बेटा कि भी यही काम करे. गुरदयाल ने कुछ समय किया भी पुश्तैनी काम, फिर कुछ समय गुरुद्वारे जाकर कीर्तन करने लगे. पर उन्हें पढ़ने लिखना का शौक था सो घर पर बैठे-बैठे ही पढ़ाई लिखाई की और स्कूल में टीचर लग गए.
साथ-साथ उपन्यास, कहानियाँ लिखने का सिलसिला चलता था. उन्हें बड़ी तमन्ना थी कि वे यूनिवर्सिटी में पढ़ाएँ. मुझे याद है जब एक बार उन्होंने मुझसे कहा था, “दीदी मेरा दिल करता है कि मैं कहीं कॉलेज वगैरह में पढ़ाऊँ. उन्होंने यूजीसी को चिट्ठी लिखी कि उनका जो भी सृजनात्मक काम है, उसे पीएचडी समान समझा जाए. वो बात मान ली गई और वो यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे. बाद में प्रोफ़ेसर बन गए. वे पंजाबी यूनिवर्सिटी के भठिंडा सेंटर में पढ़ाते रहे.”
इतने बड़े लेखक होने के बावजूद उनके आर्थिक हालत अच्छे नहीं थे. वो कभी ये बात छिपाते भी नहीं थे और वही सच्चाई कहानियोँ में भी कहते थे.
दरअसल पंजाबी लेखक के लिए लेखनी कभी रोज़गार का साधन नहीं बन सकती. अमृता प्रीतम कहा करती थीं कि मैंने 40 किताबें लिखी हैं लेकिन 100 रुपए महीना मेरी आमदनी नहीं है. गुरदयाल सिंह को भी अपनी किताबों की ज़्यादा रॉयलटी नहीं मिली और रोज़गार का साधन उन्हें ढूँढना पड़ा.
गुरदयाल सिंह को पंजाब और पंजाबी से बहुत प्रेम था, उन्होंने कभी अपने पंजाब को नहीं छोड़ा. वो रूस वगैरह गए लेकिन पंजाब की ही मिट्टी उन्हें रास आती थी. उनकी कुछ किताबें अंग्रेज़ी में भी आईं- मड़ी दा दीवा और अन्ने घोड़े दा दान.
मैं ये कह सकती हूँ कि वो भला-मानस लेखक थे- नेक दिल लेखक जिसने हमने हाशिए पर खड़े लोगों को अपनी कहानियों में आवाज़ दी
































