नेशनल बुक ट्रस्ट का साहित्य महोत्सव चांपा में आयोजित ।

0
395

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नेशनल बुक ट्रस्ट का दो दिवसीय साहित्य महोत्सव जिला मुख्यालय के शील साहित्य परिषद द्वारा किया जा रहा है। पहले दिन अलग अलग सत्रों में विभिन्न विषयों पर वक्ताओं ने विचार रखे।

न्यास के हिंदी संपादक डॉ ललित किशोर मंडोरा ने कहा न्यास के प्रकाशन के क्षेत्र में 60 वर्ष होने की दिशा में न्यास के आयोजन समूचे भारत वर्ष में हो रहे हैं। अधिक से अधिक संख्या में आयोजन का अर्थ न्यास के साथ रचनाकारों को पाठकों को और बुद्धिजीवियों को जोड़ना है। न्यास का लक्ष्य पाठकों को पुस्तकों के साथ जोड़ना है। इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के अनेक जिलों को रचनाकारों को जोड़ने का उद्देश्य भी यही हैं कि उन्हें मुख्य धारा से हर संभव तरीके से जोड़ा जाए। सत्र की शुरुआत में शील साहित्य परिषद के अध्यक्ष विजय दुबे ने कहा इस आयोजन से हमारा जिला उत्साहित है। अध्यक्ष डॉ दिविक रमेश ने कहा.

पुस्तकें शुरू से नहीं थीं। लोक साहित्य पहले आया। पुस्तक बाद में आई। राम नरेश त्रिपाठी पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने साहित्य को बटोरा। लोक साहित्य आज भी जीवित है। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य का लेखन कुछ अज्ञात लोगों ने संग्रहण किया। आज भी लोक साहित्य जीवंत साहित्य है। भूमंडलीकरण नामक शब्द आया वह बाजार देता है, बाजार की मानसिकता देता हैं। इंटरनेट की देन बाजारवाद की देन है । सूचना क्रांति के दौर में इंटरनेट प्रभावशाली माध्यम है, जिसने देश. दुनिया को साधा हुआ हैं । इंटरनेट लोकप्रिय संस्कृति का साधन है, यह अवसाद को भी जन्म देता है। कई लोग बीमारी के शिकार भी हुए हैं। उन्होंने कहा कि ई बुक्स का कंसेप्ट आ गया है, वह भी विकल्प है कागज रहित साहित्य का। जिसके माध्यम से दुनिया एक ही मंच पर जुटी है। पुस्तक भी बगैर शब्द के नहीं है। यदि शब्द नहीं होगा कथ्य नहीं होगा तो इंटरनेट प्रसारित क्या करेगा। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्य पत्रिका अट्टहास के संपादक अनूप श्रीवास्तव ने कहा नेट का और शब्द का आपस में गहरा संबंध है, नेट के आगे कभी शब्द की चुनौती हो ही नहीं सकती। नेट की दिक्कत यह है कि किसी के तीन फेसबुक में एक अकाउंट देखें और दूसरा न देखें तो फायदा नहीं। इंटरनेट का सर्वर गड़बड़ हो सकता है, पुस्तकों व शब्दों का सर्वर कभी डाउन नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पुस्तक में यह ताकत है कि वह पाठक को जोड़े रखती हैं। इंटरनेट हमारी बैसाखी हो सकता है लेकिन पुस्तकें हमारी आत्मा है। महासमुंद की डॉ अनुसुइया अग्रवाल ने भी विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम में विजय राठौर, दयानंद गोपाल, सीएस तिवारी, रोहित चतुर्वेदी सहित बड़ी संख्या में नगर के साहित्यकार उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार सतीश सिंह ने किया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here