दर्शकों ने जाना बंद खिडकियों के पीछे का सच

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जयपुर। रसरंग मंच संस्था की ओर से रविन्द्र मंच प्रांगण में आयोजित दो दिवसीय नाट्यधर्मी रंग महोत्सव के पहले दिन युवा रंगकर्मी चित्रार्थ मिश्रा और सुमित पाल सिंह का नई सोच से लबरेज नाट्य प्रस्तुति का गवाह बना। इन दो नवांकुरों के निर्देशन में प्रस्तुत नाटक ‘खिडकी जो अंदर की तरफ खुलती है’ नाटक में तीन कहानियों का मंचन किया गया। सआदत हसन मंटो की तमाशा और दो कौमें तथा जे.ए.पॉल की द टाईम बिटवीन को लेकर तैयार किए गए इस नटक में समग्र रूप से यह बताने की कोशिश की गई बंद खिडकिया देखने में तो एक जैसी लगती है लेकिन जब यही खिडकिया खुलती है तो हमारा सामना उनके पीछे छिपे सच से होता है जो हर खिडकी में अलग—अलग होता है।

नाटक ती सैनिको की व्यथा पर आधारित है। लगभग अधमरी हालत में गर्दन तक बर्फ में धंसे सिपाही किटकिटाते दांतों और लडखडाती जुबान से मदद के लिए गुहार लगा रहे है लेकिन उनकी गुहार सिवाय सन्नाटे के कोई और नही सुन सकता था। वो समय उनके लिए किसी इंसान के जवीनकाल से भी ज्यादा बडा और भारी था। मदद आने तक उन्हे ये समय किसी न किसी तरह काटना ही था, इसलिए तीनों एक दूसरे को अपनी एक कहानी सुनाना शुरू करते है। नाटक मंचन की दृष्टि से बेहतर रहा। खासकर सैनिकों की व्यथा कथा को उजागर करने के लिए उपयोग में लिए गए अर्थपूण संवाद ऐसे थे जो नाटक के छिपे मर्म को सहज ही उजागर कर रहे है।

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