डायरी : लोगों का काम है कहना…

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कुमार अजय
लेखक — कुमार अजय

‘संजू’ का पोस्टर जब पहली बार ही अखबार में देखा था, तभी से ही मन था कि फिल्म देखनी है। पोस्टर में ‘संजू’ की भूमिका में रणवीर कपूर पांच-छह अलग-अलग गेटअप में थे लेकिन बिल्कुल संजय दत्त ही लग रहे थे। हालांकि ये संजय दत्त के जीवन के विभिन्न रंग हैं या उनकी स्वाभााविक अदाकारी कि कई फिल्मों में भी वे अपना ही रोल करते नजर आते हैं। तो आज रविवार था और थोड़ी-सी खुशियों और बहुत-सी उदासियों से घिरी हुई इस शाम को, पैदल ही मंथन थिएटर की ओर चल दिया। बड़े दिनों से सिनेमाघरों के बाहर थोड़ी भीड़ देखी। यूं फिल्म भी काफी दिनों बाद ही देख रहा था। इस तरह अकेले तो शायद जिंदगी में पहली ही बार। टी.वी या कम्प्यूटर पर पूरी फिल्म देख सकें, ऐसी एकाग्रता जीवन में अब नहीं बची है। सो फिल्म देखनी थी तो सिनेमाघर ही एक उपाय था। टिकट खिड़की पर तीन लाइनें लगी थीं। एक लाइन पुरुषों की थी जिनमें प्रायः युवा ही थे। बगल में दूसरी पंक्ति में युवतियां थी। दोनों पंक्तियां एक ही काउंटर से टिकट ले रही थीं। युवतियों के पास ही एक लाइन और थी, जिसमें युवतियों से भी कुछ अधिक संख्या में तथाकथित पुरुष उन युवतियों की सुरक्षा के लिए वहां खड़े थे। यह सवाल तो यूं भी बहुत पुराना हो चुका कि पुरुष सुरक्षा में खड़ा है तो फिर युवतियों को खतरा आखिर किससे है। वहां खड़ी ज्यादातर युवतियों के कपड़े और बातचीत का ढंग माॅडर्न है लेकिन साथ खड़े पुरुषों का यह ‘सुरक्षा चक्र’ सारे माॅडर्निज्म की हवा निकालते हुए नजर आ रहा है। लगा कि जाने क्यों और कितनी असुरक्षाओं के बीच हम जी रहे हैं। फिल्म भी कहीं न कहीं हमारी इन्हीं असुरक्षाओं की बात करती है। फिल्म के मुताबिक, संजय दत्त के परिवार को जब धमकियां मिलती हैं तो वह हथियार रख लेते हैं। वैसी ही किसी असुरक्षा के भाव में वे अंडरवल्र्ड के लोगों से संपर्क रखते हैं और उन्हें खुश रखने की कोशिश में वह इस दलदल में फंस जाते हैं, बकौल फिल्मकार फंसा दिए जाते हैं। फिल्म पर संजय दत्त के महिमामंडन का आरोप है और फिल्म संजय को हालात और दोस्त का मारा इंसान साबित करते हुए कहती है कि ड्रग्स और हथियार दोनों ही मामलों में संजय को उसके दोस्तों ने भरमाकर फंसा दिया। इस आरोप के बीच, मुझे लगता है कि हर किसी को अपनी बात कहने का हक है और संजय भी अपने फिल्मकार दोस्त के बहाने यह करते हैं तो क्या गलत करते हैं। संजय कितने गलत और कितने सही हैं, यह सवाल अपनी जगह है लेकिन सवाल यह भी है कि हमने बख्शा भी किसको है। महापुरुषों के मुंह पर किसी न किसी बहाने कालिख पोती जा रही है और नए-नए महापुरुषों की स्थापना की जा रही है। सार्वजनिक तौर पर जीने वालों की व्यक्तिगत शुचिता का अपना महत्व है लेकिन यदि इसी एक बहाने से हम उनकी उपलब्धियों को बिसराना चाहें तो शायद ही कोई पाक-साफ निकल पाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण संयोग ही है कि सार्वजनिक जीवन में बेहतर करने वालों की व्यक्तिगत जिंदगी में हजार तोहमत निकल आएंगी। अक्सर तो देखा ही यही जाता है कि सार्वजनिक जीवन में स्थापित होने के बाद कई व्यक्तियों को घर में कुछ स्थापना मिलती है और कुछ तो बाद में भी प्रमोद महाजन बन जाते हैं। कई बार लगता है कि यह धरती एकदम आम समझ वाले व्यक्ति के लिए मुफीद है। थोड़ा-बहुत वही स्वाभाविक जिंदगी जी सकता है। इंटेलेक्चुअल और प्रतिभावान समझे जाने वाले लोगों की जिंदगी में हजार पेंच रहते हैं।
खैर, जिस तरह फिल्म में संजय को अबोध बताया जा रहा है, उतनी सफाई तो आप किसी भी पेशेवर अपराधी से ले सकते हैं। जो पेशेवर नहीं हैं, वे तो हालात के मारे हैं ही। और संजय भी, पेशेवर तो नहीं ही हैं। मैं तो यूं भी अक्सर कहता हूं कि जो लोग कुदरत की व्यवस्था में बहुत ज्यादा दखल करते हैं और करना चाहते हैं, वे सब भले ही दुनिया में होशियार, तेजतर्रार और सयाने समझे जाएं, कहीं न कहीं भोले ही हैं। और यह तो अक्सर देखा है कि हर बात में गणित की सी होशियारी बरतने वाले अक्सर जिंदगी के समीकरणों में उलझकर फेल हो जाते हैं। आप रिश्तों को निभाने के लिए कितनी ऊर्जा खर्च करते हैं जबकि एक मुस्कराहट बहुत सारी चीजों को उससे बेहतर कर सकती है। यूं भी ‘जीओ और जीने दो’ से बेहतर जिंदगी का कोई सूत्र हो सकता है, लगता नहीं है। लेकिन असुरक्षा का कोई भाव हमें इस तरह रहने नहीं देता और यह असुरक्षा भी कहीं न कहीं भीतर की किसी कमजोरी से ही उपजती है।

सुनील के फेव्रिट बताए जा रहे जिन तीन फिल्मी नग्मों के सहारे फिल्म ने संजू की जिंदगी का फलसफा सैट करने की कोशिश की है, उसमें से एक ‘दुनिया में जीना है तो काम कर प्यारे’ की पहली पंक्ति की बजाय अगली पंक्ति ‘आते-जाते सबको सलाम कर प्यारे’ को शायद संजू ने ज्यादा गहराई पकड़ लिया और अंडरवर्ल्ड की सलामी के चक्कर में फंस गए। फिल्म हो या जिंदगी, गलतियां हो ही जाती हैं। उन्हीं गलतियों से कोई ‘संजू’ बनता है और वैसी ही गलतियों के बावजूद कोई ‘संजू’ बन जाती है। खैर, फिल्म में संजू कहता है कि कोर्ट ने उसे आतंकवादी नहीं माना, लेकिन उसके इस आरोप से बरी होने को किसी ने हाइलाइट नहीं किया जबकि आरोपों के बाद उसे कहने हर कोई आतंकवादी कहने लगा था। यूं एक तरह से अदालत से बरी हो चुका आदमी भी बस तकनीकी तौर पर ही बेगुनाह होता है, ठीक वैसे ही जैसे सजा से आप हमेशा अपने अंतकरण में यह तय नहीं कर सकते कि सजायाफ्ता गुनहगार रहा ही होगा। यह एक तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें संभव है कि जज की कुर्सी पर बैठा आदमी जो लिख रहा है, उससे खुद सहमत नहीं होते हुए भी लिखने को विवश होता है। पिछले दिनों कानून से जुड़े एक मित्र से हुई आपसी चर्चा में उनका कहना था कि अदालतों पर केवल तोहमत आती है, मामले तो अदालत के बाहर ही सैट हो जाते हैं और न्यायाधीश वहां विवश होता है। इस तरह इंसाफ पर कानून अक्सर भारी पड़ जाता है और एक जैसी लगने वाली ये दो चीजें एक दूसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं। अपराध की व्याख्या करते हुए अक्सर कहा जाता है कि कोई भी घटना पहले अपराधी के दिमाग में कारित होती है, फिर वह उसे वास्तविक अंजाम देता है। हममें से कितने हैं जो ईमानदारी से कह सकें कि एक भी अपराध आज तक हमारे दिमाग में घटित नहीं हुआ। दिमाग को इस तरह पढने की मशीन होती और केवल गलत सोचने पर ही सजा का प्रावधान होता तो हम सब किसी जेल में होते या फांसी चढ़ चुके होते। यूं भी जिस गीता पर हाथ रखकर सच बोलने की कसम खिलाई जाती है, वह तो खुद कहती है कि शरीर तो नश्वर है और आत्मा अमर है। और हम जानते हैं कि कोई भी न्यायाधीश आत्मा को सजा देने में सक्षम नहीं है। हालांकि जो आत्माएं थोड़ी बहुत भी ‘जिंदा’ हैं, वे अपराध के तत्काल बाद ही सजा भुगतना शुरू कर देती होंगी। कानून की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि जिस व्यक्ति को सजा दी जाती है, वह कहीं से भी ‘वह’ व्यक्ति नहीं होता है, जिसने अपराध किया है। पल-पल बदलते अंतकरण में जाने कितने बदलाव हो जाते हैं और इस बदले हुए आदमी को सजा दिए जाने का औचित्य बस यही है कि हमारे पास इससे बेहतर दूसरी कोई व्यवस्था नहीं है।
मां-बेटे और दोस्ती के रिश्तों को नए अर्थों से परिभाषित करती फिल्म अब तक की सार्वजनिक छवि के मुताबिक ही सुनील दत्त को एक जबरदस्त पिता साबित करती है। हम जो बच्चों की जरा-सी शरारतों से तंग हो जाते हैं और छुटपुट नुकसान, गलतियों पर अपना धैर्य खो देते हैं, यहां सीख सकते हैं कि वास्तव में पिता होना क्या होता है। राजनैतिक निष्ठा पर आप भले ही सवाल करते रहें, परेश रावल का अभिनय तो हमेशा से ही विश्वसनीय रहा है। रणवीर के साथ मिलकर पिता-पुत्र के दृश्यों मंें वह कई बार इम्मोशनल करते हैं। फिल्म में कृतज्ञ संजू कहता भी है कि सुनील दत्त न होते तो शायद वह जिंदा नहीं होता। सभी यही कहते हैं और यह काफी हद तक ठीक भी है कि उन्होंने हर बार संजू को निकालने में अपना सब कुछ झोंक दिया। संजू की बदनामी का नुकसान जो सुनील को होना था, हुआ ही लेकिन एक पिता के पास और क्या चारा है। सोचा यह भी जा सकता है कि शायद वे सुनील दत्त न होते तो संजू भी अपराधी न होता। उनकी फटकार से तंग आकर पहली बार जब संजू ड्रग लेता है और कहता है कि पिता ने कभी उसके काम की तारीफ नहीं की। बाद में सुनील खुद भी संजू के सामने स्वीकार करते हैं कि अपनी व्यस्तताओं से तंग आकर वे फटकार देते हैं। यह बहुत सामान्य ढंग से कहा गया है लेकिन हो सकता है कि असल जिंदगी में यह व्यस्तता, बच्चों की तरफ ध्यान नहीं दे पाने की मजबूरी और किसी भी निराशा या कुंठा में दी गई फटकारें और भी ज्यादा प्रभावी व निर्णायक रही हों संजू को ड्रग एडिक्ट बनाने में। पिता भी यदि सुनील दत्त न होते और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं होते तो संभवतः हथियार जैसी जरूरतें भी न होतीं। संजय एक जगह कहते भी हैं कि पिता की सुरक्षा के लिए उसने हथियार रखा। हालांकि सुनील दत्त तैश में आकर ही जवाब देते हैं कि इससे अच्छा था कि उस हथियार से तू मुझे ही मार देता।
अजीब संयोग है कि पारिवारिक रिश्तों को नया अर्थ देने वाली फिल्म होने के बावजूद अपने कुछ संवादों के कारण संजू परिवार के साथ बैठकर देखने वाली फिल्म नहीं है, हालांकि इससे बहुत ज्यादा हम हाल की कई फिल्मों में देख और सुन चुके हैं। संजू ने मीडिया को कठघरे में खड़ा करते हुए जो इल्जाम लगाए हैं, वे भी तरह का अर्द्धसत्य ही हैं। मीडिया को कोसते हुए संजू कहते हैं कि आतंकवादी होेने का आरोप जब खारिज हुआ तो किसी भी मीडिया ने इस खबर को अहमियत न दी जबकि इससे पहले उसे आतंकवादी बताने में सब एक से आगे एक नजर आ रहे थे। बात एक ढंग से ठीक भी है कि चीजें केवल टीआरपी के नजरिए से देखी जाएंगी तो कुछ गड़बड़झाला हो ही जाएगा। खबर लिखते हुए यह दूसरा पहलू हमारे सामने होना ही चाहिए। लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि कहीं न कहीं हम कोई गुंजाइश देते हैं तो मीडिया उस पर खेलता है। जो आदमी हथियार रखता है, अंडरवर्ल्ड के लोगों से जिसके संपर्क हैं, उसे आतंकवादी कहे जाने पर किसी एकदम शरीफ आदमी की तरह इतना शर्मिंदा या गुस्सा होने का हक तो नहीं ही है। और फिर जिस ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’ के संदेश के साथ फिल्म खत्म होती है, उसे देखते हुए तो मीडिया पर सारा गुस्सा नाजायज ही है। सवालिया निशान के साथ छपती खबरों पर फिल्म सवालिया निशान लगाती है लेकिन यह बात भी हमें भूलनी नहीं चाहिए कि केवल सवाल ही हैं जो हमें कहीं न कहीं सच तक ले जाते हैं। मीडिया और न्यायपालिका पर चाहें जितने इल्जाम हम लगाते रहें, इस तानाशाह होने को आतुर व्यवस्था पर कहीं न कहीं एक लगाम है, जो इन दोनों ने ही लगा रखी है। लेखक — कुमार अजय

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